Wednesday, 17 May 2017

मेरी किस्मत में तेरा नाम









मैं तुम पर बिगडा 
करता हूं कि...
मेरी किस्मत में
तेरा नाम नहीं लिखा
कि तेरा हाथ मेरे
हाथों में नहीं दिया
कि तेरी सांसों से
मेरे जीवन की डोर
नहीं बांधी
कि तेरा साथ
मुझे नहीं बख्शा
लेकिन ये सब
कहते हुये मैं ,
शायद ये भूल जाता हूं...
कि मेरा नाम तेरी
दुआओं में शामिल
था की नहीं ?

उजाले की पहली किरण










उजाले की पहली 
किरण से गोधूलि
की सांझ तक...
पानी की शीतलता से
अग्नि की आंच तक...
मिथ्या की संतुष्टि से
सत्य की प्यास तक...
विछोह की पीडा से
मिलने की आस तक...
जीवन के प्रारम्भ से
म्रत्यु की अंतिम सांस तक...
मैं खुद को तेरी हंसी के
उजले सवेरे में देखा करता हूं
मैं खुद को तेरे कल के
बसेरे में देखा करता हूं

मेरी तन्हाई












एक तुम्हारे दूर 
होने से नींद मेरी
आंखों से कोसों
दूर रहती है
बोझिल होती हैं पलकें
मगर आराम नहीं
ये रात मुझे जगाये
रख कर बहुत
कुछ कहती है
मेरी तन्हाई और
अपने अंधेरे को
तौला करती है,
पता नहीं...
मेरे हिस्से में कडवाहट
ज़्यादा या वो ही ज़्यादा सहती है?

Tuesday, 16 May 2017

उजाला सुबह का 









मैं हर उस पल में 
दुआ करता हूं कि 
बातों का हर प्याला 
रीत जाये... और 
अमावस से भी अंधेरी 
ये चांदनी रात बस 
किसी तरह बीत जाये...
और हो उजाला सुबह का 
और मैं दौड़ पडू तुमसे 
मिलने को ताकि 
तुम्हे बता सकू 
अपनी सारी बेचैनी 
और पा सकू थोड़ा 
सा चैन तुमसे सुनकर
की तुम हो हर पल
मेरे साथ 

तुम और ये रात





लेकिन ना जाने किन्यु
तुम और ये रात होती 
हो इतनी जल्दी में 
मेरी लाख मिन्नतों के
बाद भी कोई भी पल 
एक पल से लम्बा होता ही नहीं 
भागी चली जाती हो तुम 
और ये रात मेरे सपनों को रौंद कर 
और बिखेर देती है 
सूरज की रौशनी मेरे कमरे में 
मनो तुमने फैला दिया हो 
अपना सिन्दूर जाने के पहले
पुरे कमरे में शायद तुम 
नहीं चाहती लोग देखे तुम्हे 
मेरे रंग में रंगे हुए और
उसी पल टूट जाते है मेरे 
सारे सपने

मेरा वज़ूद बिखर जाए









मैं हर पल चाहता हु 
कुछ देर और ठहर जाओ
बनकर हंसी तुम मेरे घर
और मेरा वज़ूद बिखर जाए
बेतरतीब सा जिसे तुम
समेट ना सको इन थोड़े
पलो में और तुम्हे रुकना पड़े
हमेशा के लिए यंहा
और मैं सुन सकू तुम्हारी
सितार की झंकार सी बातें..
म्रदु कोमल क्षणों की गवाह बनी रातें...
डर के जंगल में रात की रानी सा
महकता रहे तुम्हारा सानिध्य
बस यही सब सोचता हु मैं आज कल 

प्रतीक्षारत हूँ सूरज बन





तुम कब बन कर मिलोगी मुझे 
रात जैसे सूरज थककर
रात की बांहों में समाता है 
और रात उसकी आग को
बुझाती है उस पहर जब 
चारो तरफ छाया रहता है 
घुप्प अँधेरा और उसे 
ओस से नहला चांद सा शीतल
बना कर करती है उसका श्रृंगार 
अपने यौवन से और उसको
लगाती है टिका अपने स्पर्श का 
फिर अपने काले ,घने ,लम्बे केशु 
में ढक लेती है उसको कभी महसूस करो
उस प्रेम को जो पृथ्वी पर आदिकाल 
से चला आ रहा है और चिरकाल तक चलेगा
सूरज और रात का अद्भुत मिलन मैं भी 
प्रतीक्षारत हूँ सूरज बन अपनी रात की बांहों में
समां जाने को 

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...