Wednesday, 17 May 2017
Tuesday, 16 May 2017
तुम और ये रात
लेकिन ना जाने किन्यु
तुम और ये रात होती
हो इतनी जल्दी में
मेरी लाख मिन्नतों के
बाद भी कोई भी पल
एक पल से लम्बा होता ही नहीं
भागी चली जाती हो तुम
और ये रात मेरे सपनों को रौंद कर
और बिखेर देती है
सूरज की रौशनी मेरे कमरे में
मनो तुमने फैला दिया हो
अपना सिन्दूर जाने के पहले
पुरे कमरे में शायद तुम
नहीं चाहती लोग देखे तुम्हे
मेरे रंग में रंगे हुए और
उसी पल टूट जाते है मेरे
सारे सपने
मेरा वज़ूद बिखर जाए
मैं हर पल चाहता हु
कुछ देर और ठहर जाओ
बनकर हंसी तुम मेरे घर
और मेरा वज़ूद बिखर जाए
बेतरतीब सा जिसे तुम
समेट ना सको इन थोड़े
पलो में और तुम्हे रुकना पड़े
हमेशा के लिए यंहा
और मैं सुन सकू तुम्हारी
सितार की झंकार सी बातें..
म्रदु कोमल क्षणों की गवाह बनी रातें...
डर के जंगल में रात की रानी सा
महकता रहे तुम्हारा सानिध्य
बस यही सब सोचता हु मैं आज कल
प्रतीक्षारत हूँ सूरज बन
तुम कब बन कर मिलोगी मुझे
रात जैसे सूरज थककर
रात की बांहों में समाता है
और रात उसकी आग को
बुझाती है उस पहर जब
चारो तरफ छाया रहता है
घुप्प अँधेरा और उसे
ओस से नहला चांद सा शीतल
बना कर करती है उसका श्रृंगार
अपने यौवन से और उसको
लगाती है टिका अपने स्पर्श का
फिर अपने काले ,घने ,लम्बे केशु
में ढक लेती है उसको कभी महसूस करो
उस प्रेम को जो पृथ्वी पर आदिकाल
से चला आ रहा है और चिरकाल तक चलेगा
सूरज और रात का अद्भुत मिलन मैं भी
प्रतीक्षारत हूँ सूरज बन अपनी रात की बांहों में
समां जाने को
Subscribe to:
Posts (Atom)
उषा का प्रादुर्भाव
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
-
अक्सर ही मुझे यु लगता है तुम मेरे आस -पास ही हो और मैं तुम्हें पहचान रहा होता हूँ अक्सर होता है ये भ्रम मुझे शीशे के उस पार तु...
-
क्या इतना ही काफी नहीं है तुझे प्यार करने के लिए की ? चाहता हूँ, भर दूँ तुम्हारी झोली खुशियों से ना रहे दुःख का एक कण भी ...
-
तुम नहीं जानती क्यूँ करता रहा हूँ मैं ऐसा और करता ही रहता हूँ हमेशा , जहाँ भी लगता है तुम्हारा कुछ भी सुराग पहुँच जाता हूँ मैं ...






