Saturday, 7 April 2018

मेरी आकंठ प्यास

मेरी आकंठ प्यास --------------------

तुम्हारे छूने भर से  
नदी बन तुम्हारे ही 
रग-रग में बहने को 
आतुर हो उठती हु ,
तुम बदले में रख 
देते हो कुछ खारी बूंदें,
मेरी शुष्क हथेलियों पर 
जो चमकती हैं तब तक 
मेरी इन हथेलिओं पर
जब तक तुम साथ होते हो ,
मेरे और तुम्हारे दूर जाते ही 
लुप्त हो जाती है 
ठीक उस तरह 
जैसे सूरज के अवसान पर 
मृगमरीचिका लुप्त हो जाती है, 
और तब मेरी आकंठ प्यास 
को तुम्हारी वो कुछ खारी-खारी 
बूंदें भी अमूल्य लगने लगती है 

Friday, 6 April 2018

एक हमसफ़र


एक हमसफ़र---------------

कब तक तुम यु ही 
दुनयावी दिखावे के लिए 
मेरी चाहतों की ग्रीवा 
को दबाये रखोगी 
कंही ऐसा ना हो की 
की भूलवश तुम्हारे 
हाथों के दवाब से मेरी 
वो चाहते दम तोड़ दे 
फिर ना कहना जब तुम्हारा 
ये निसकलंक यौवन मेरी   
चाहतों की मौत का वज़न 
उठाकर चलते हुए ज़िन्दगी 
की राह पर भटक कंही 
और पराश्रय ले ले  

Thursday, 5 April 2018

विरह की तड़प























विरह की तड़प
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गर चाहो समझना 
कभी विरह की तड़प 
को महसूसना तो  
देखना सूखे पत्तों की 
फड़फड़ाहट तुम्हे सुनाई देंगी 
उनकी बेचैनी वो सूखे पत्ते 
करहाते हुए कहते है 
अपने विरह की कहानी 
दर्द होता है सुनते ही 
उनकी कराहटें मन होता है 
उन्हें फिर से रोप दू उसी 
पेड़ में जंहा से अलग हुए 
होंगे वो और ये सोचते हुए
रुक जाता हु मैं भी एक जगह  
की कई बार मौसम भी 
ठहर जाता है भूलकर   
अपनी नियति और उस 
नियति से छेड़छाड़ गवारा 
ना होगा उसे शायद उसी 
तरह नहीं तड़पना चाहती  
मैं भी उन पत्तो की तरह 
तुमसे अलग होकर 

Wednesday, 4 April 2018

जाने कैसी तृप्ति है























                जाने कैसी तृप्ति है
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                इस मतलबी दुनिया
                में तुम एकमात्र
                आसक्ति हो मेरी
                कहने को तो मुझे
                सांस लेने की भी
                फुर्सत नहीं थी पहले
                जबसे तुम मिली हो
                खुशियां जंहा भी दिखती है
                समेट लेता हूँ और चाहता हु
                उन सबको तुम्हे सौंप देना
                पर मेरे तुम्हारे जीवन में
                आने के बाद भी तुम्हे
                अब तक फुर्सत ही नहीं मिली
                अब तक ठीक से मुझे
                समझने की जानने की
                फिर भी जाने कैसे
                अपनी कनखियों से
                देख मुझे प्राप्त करना
                चाहती हो तुम
                जाने कैसी तृप्ति है
                ये तुम्हारी जो देखने
                मात्रा से पूरी हो जाती है ...?
                                                          @srverma

Tuesday, 3 April 2018

तुम अक्सर सवाल करती हो..

तुम  अक्सर सवाल करती हो..
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क्यूँ सोचता हूँ मैं तुम्हे ?
जरा पास आओ ,
बताना है आज ,
क्यूँ सोचता हूँ तुम्हे...
तुम्हारी खनक भरी हंसी गूंजती है
हर वक़्त मेरे कानो में ..
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे,
तुम्हारा अक्स मेरे दर-ओ-दिवार
पर उभर आता है,
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे...
रात के अँधेरे में चाँद की चाँदनी
बनकर जब मेरे ख्यालों की
छत पर पायल पहन कर टहलती हो,
तब मज़बूर हो जाता हु तुम्हे सोचने के लिए ...
घने काले बादल जब घिर आते हैं ,
और उन बादलों से रिसकर बूंदों के
स्वरुप गिरती हो मुझ पर
तो भीगा-भीगा मैं ,
मज़बूर हो जाता हु तुम्हे सोचने के लिए ...
तब सोचता हूँ तुम्हे...
जब सुबह की पहली किरण मेरे सिरहाने तक आती है,
और तुम छू लेती हो गुनगुने अहसास की तरह,
तब सोचता हूँ तुम्हे...
और इतना कुछ घटित होने के बाद
भी खुद को तन्हा पाता हु तो
मज़बूर हो जाता हु तुम्हे सोचने के लिए ...

Monday, 2 April 2018

तुम क्यूँ इतना सोचते हो मुझे

 तुम क्यूँ इतना सोचते हो मुझे 

मैं नहीं सोचती तुम्हे इतना 
जितना तुम सोचते हो मुझे 
क्योंकि मुझे तो तुम हर घडी दिखाई देते हो...
और कभी कभी तो तुम्हे छू भी लेती हूँ,
जैसे हम छू सकते है हवाओं को 
ठीक उसी तरह मैं भी छू लेती हु तुम्हे  ....
कई बार तो भीग भी जाती हूँ, 
दूब पर पड़ी ओस की बूंदों की तरह ..
जब तुम बिलकुल करीब से गुजरते हो 
लेकिन तुम क्यूँ इतना सोचते हो मुझे...?
अच्छा बताओ मैं कैसे न सोचूं तुम्हे.....!!!
अधूरी मुलाकात छोड़ जाती हो...
आधी अधूरी बात छोड़ जाती हो...
और रह जाता हूँ सिर्फ मैं अकेला
जो कुछ भी होता है मेरे अंदर 
थोड़ा बहुत कुछ तुमसे वो भी 
जाते जाते निचोड़ स्वयं में 
प्रवाहित कर ले जाती हो तुम 
आधे अधूरे सपनों के साथ,
कुछ खामोश से ख्यालों के साथ, 
रात भर जागने के लिए,
तुम्हे सोचने के लिए,
सुबह के इंतज़ार में ...
तुम्हारी बातों के प्यार में...
रह जाता हूँ तन्हा ...
तुम्हे सोचने के लिए....
इसलिए इतना सोचता हु तुम्हे 

Sunday, 1 April 2018

कब के बिछुड़े हुए हम




कब के बिछुड़े हुए हम
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जो कहती नही थकती थी 
मेरे लिए मुश्किल होगा जीना...
तुम्हारे संवाद के बिना वो कई
दिनों से आयी नहीं है पास मेरे
तबियत थोड़ी सी नासाज़ जो हुई मेरी
मैंने तो प्रतिउत्तर में सिर्फ
इतना ही कहा था तुम्हारे
बिना बक-बक-करने वाला राम
बस थोड़ा उदास थोड़ा गम-सुम सा
रहेगा इंतज़ार में की कब तुम आओ
और मेरे दिन जलते हुए अलावा
की जगह सावन की फुहारों से भीगे
और जो रात सर्द बर्फ सी हुई कपकपा
रही होंगी वो रातें तुम्हारे आने से
रजाई में सिमट तुम्हारी नरम नरम
उष्मा से भर खुल कर सोयेगी और       
मेरे कंठ में सोती हुई स्वर कोकिला 
तुम्हारे प्रेम के गीत गा गा कर ज़माने
को बताएगी की कब के बिछुड़े हुए हम
आज कंहा आ के मिले मैंने जैसा कहा था
वैसे ही हु तुम्हारे इंतज़ार में आज   
   

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...