Monday, 18 March 2019

वापस कोई नहीं आता !

वापस कोई नहीं आता !
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जिस्म के रास्तों से गुज़र कर, 
रूह की आरज़ू में जो भी बसा; 

वो वापस कभी ना आया !

रूह के अकेलेपन में उलझ कर, 
रूह की आरज़ू में जो भी निकला; 

वो वापस कभी ना आया !

लोग फिर भी ये देखकर,  
समझते क्यूँ नहीं हैं; 

जो गया वो वापस कभी ना आया !

लोग फिर भी ये देखकर,  
स्वीकारते क्यूँ नहीं करते हैं;  

जो गया वो वापस कभी ना आया !

जिस्म के रास्तों से गुज़र कर, 
रूह की आरज़ू में जो भी बसा !

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