Tuesday, 12 March 2019

कुदरत का नज़ारा !

कुदरत का नज़ारा !
••••••••••••••••••••• 
जो न होता कुदरत में, 
सूरज का ताप और बादलों 
की नमी का नजारा;

तो बताओ कैसे रहता, 
धरती के आँचल का रंग 
इतना हरहरा और प्यारा; 

दिल में जलती सूरज 
सी आग और नयनों से, 
टिप टिप होती बस बरसात;

कुदरत के रंग सा ही तो 
होता है, इस मोहब्बत का  
भी मौसम और नज़ारा;

लेकिन शायद कहने और 
करने की, जिसमे सारी हदें 
टूट जाती है, वही तो बेइंतेहा 
मोहोब्बत कहलाती है !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...