Wednesday, 13 March 2019

सबल समृद्ध नारी है वो !

सबल समृद्ध नारी है वो !
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तू जिसको कभी कहता था, 
वो तेरी सखी और सहेली है;
  
खुद-ब-खुद से ही वो बात करती,  
आज वो खुद की ही सहेली है;
  
आखिर कब तू उसको जानेगा, 
क्या ऐसी वो अनसुलझी पहेली है;

हर एक दुःख और दर्द वो झेली है, 
आज वो दर्द की बिसात पर फैली है;

तेरे जंहा को जो महकाती है,
वो वही चंपा और चमेली है;

अपनी परिधि में जो समेटे तुझे, 
वो उन्ही उठे हाथों की दुआ है;

जिसमे निकलता तो सारा जंहा है, 
फिर भी आज वो क्यों रहस्मय हवेली है ?

करे वो जो तेरे भी बस में नहीं है,
हाँ वो आज की सबल समृद्ध नारी है; 

फिर भी आज वो दूसरी पसंद क्यों है,  
गर वो दुर्गा है तो सिर्फ नौ दिन की क्यों है ?  

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