Tuesday, 7 May 2019

अंधेरों को कोसते लम्हे !

अंधेरों को कोसते लम्हे !
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जिस तरह किसी, 
मुफ़लिस की तकदीर का, 
सितारा बहुत दूर कहीं अँधेरी, 
राहों में भटक कर दम तोड़ रहा है; 
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शाम होते ही बस्ती, 
का चप्पा-चप्पा घुप्प, 
अंधेरों में डूब जाता है;
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ऐसे में सुनने की, 
ताकत से सरगोशियां, 
करते हुए सन्नाटें है, और 
अंधेरों को कोसते हुए लम्हे है; 
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और दूर से आती हुई, 
किसी बेबस की पुकार, 
जब एहसासों से टकराती है;
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तब थरथराते हुए, 
वज़ूद दुआओं में लीन, 
हो कर ख़ुदा को आवाज़ देते है !

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