Thursday, 30 May 2019

मैं तो उसके पास थी !


बहकी हुई नज़र थी लेकिन फिर भी उदास थी ,
मय तो दूर थी उस से मगर मैं तो उसके पास थी ;

बे-शक उसने बुलाया जिसे वो रूठी हुई एक रूह थी ,     
मगर शिकस्त-ए-दिल में मेरे ज़िंदा मगर एक आस थी ;

गर तू मेरे दिल-ओ-दिमाग पर छाया हुआ न था ,
तो वो हस्ती कौन थी जो मेरे दिल में समायी थी ;

अक्सर बारिशों में पेड़ों के पत्ते तो धुल ही जाते है ,  
मगर धरती कोख़ में अभी भी हरियाणे की प्यास थी ; 

कोंपलें जब भी आँख खोलती है तो क्या देखती है ,
उनकी हद्द-ए-नज़र तलक उनकी ये ज़मीं बे-लिबास थी ; 

दिल में एक ताज़ा खिला हुआ गुलाब था ,
मगर आँखों में सारी तमन्नाएँ उदास थी ;

इन दिनों मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ ,
वो कौन था जिस के लिए मेरे दिल में प्यास थी ! 

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...