Friday, 17 May 2019

सुन !


सुन, 
तू आ और आकर
मेरे दिल की वीरान 
बस्ती में अपने प्यार की हलचल कर दे; 
सुन, 
मेरे ख्वाबों के हरे भरे
गुलिस्तां में तू आ और 
आकर उसे चाहे जंगल कर दे; 
सुन, 
तू आ और आकर 
मेरे होश उड़ा या चाहे 
तो मुझे पागल ही कर दे; 
सुन, 
मैं अधूरी हूँ अभी 
तू आ और आकर 
मुझे मुकम्मल कर दे; 
सुन, 
तू आ और आकर
वादी-ए-मोहब्बत की हर एक 
राह को अब तू जल -थल कर दे; 
सुन, 
तू आ और आकर
सर पर मेरे अपने प्यार 
का वो आसमान कर दे !

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