Tuesday, 14 May 2019

घूर्णन गति परिक्रमण गति !


घूर्णन गति परिक्रमण गति !

तुम जब जब होती हो साथ मेरे, 
चित्त की अशुद्धियों का छय होने लगता है;

तुम जब जब होती हो दूर तब त्वरित गति से, 
फैले प्रकाश को अँधेरा अपना आवरण उढ़ा देता है; 

और मेरे चारो ओर छा जाता है घुप्प अँधेरा,  
इस मनःस्थिति में दुख ही दुःख पीडा ही पीड़ा छा जाती है;

मेरी काया के चारो ओर ऐसे में बसंत मेरे द्वार, 
पर खड़ा दस्तक दे रहा हो तो भी मुझे कहाँ सुनाई देता है; 

जिस के फलस्वरूप बसंत बैरंग लौट जाता है, 
मेरे द्वार से और दो गतिओं पर घूमने वाली धरा; 

घूर्णन गति को त्याग परिक्रमण गति पर अटक जाती है,
जिसमे नित्य की जगह वर्ष लगने लगते है; 

उसे अपना ऋतू चक्र बदलने में तुम ही सोचो, 
कितना फर्क पड़ता है एक तुम्हारा साथ न होने पर !

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