Saturday, 11 May 2019

रिश्ते नाते


खिले हैं गांवों में भी, 
नफरत के फूल धीरे-धीरे;

जैसे पांव की धुल पहुँचती है, 
सरों तक बड़े धीरे-धीरे;

अभी कुछ महीने लगेंगे, 
उन पेड़ों पर फल आने में;

फिर बदल जायेंगे लोगों,  
के पाले भी धीरे-धीरे;

घाटे के कोई रिश्ते नाते,
उम्र भर कायम नहीं रहते;

टूट ही जाता है एक ना एक दिन,
झूठ का रिश्ता भले ही धीरे-धीरे; 

उसे जुर्म इकरार करने दो पहले, 
फिर हर इलज़ाम वो कर ही लेगा, 
कुबूल अपने भले ही धीरे-धीरे;

गर ऐसा ना हुआ तो ये धरती भी, 
एक ना एक दिन बंज़र हो जाएगी, 
गुलों की जगह बबूल ले लेंगे धीरे-धीरे ! 

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