Sunday, 12 May 2019

माँ !


माँ !

जिंदगी नाम की जो ये किताब है, 
उस किताब की जिल्द "माँ" है; 

जब किताब की जिल्द फट जाती है, 
उस किताब के पन्ने भी जल्द बिखर जाते है;

इसलिए किताब की जिल्द को संभाल, 
कर रखने की जिम्मेदारी भी हम-सब की है;

ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार जिल्द अपने, 
पन्नो को रखती है बाहरी परिवेश से संभाल कर; 

जिल्द बिना इस ज़िन्दगी नामक किताब, 
की कल्पना भी जैसे बेमानी सी लगती है; 

मोह ममता के सारे ताने-बानो से बनी ये जिल्द, 
अपने पन्नों को सदा खुद में थामे रखती साथ है;

क्योंकि माँ नुमा ये जिल्द अपने पन्नों, 
को कभी बिखरते हुए नहीं देख सकती है !   

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