Sunday, 17 February 2019

सवा सौ करोड का जज्बा !

सवा सौ करोड का जज्बा !
••••••••••••••••••••••••••••

वतन की खातिर जान दी, 
उसका क्या मलाल है; 

वतन की आन के आगे, 
आज सब कुछ फीका है,

आज सवा सौ करोङ में,
क़ुरबानी का जज्बा जागा है;

वक्त पड़ने पर मैं भी अब,  
कुछ न कुछ कर जाऊंगा;

वतन-ए-अमन की खातिर 
मैं भी अपनी जान गवाऊंगा;

सिखलाऊंगा अपनी औलादों को,
कभी न हारना भेड़ियों की तदादों से;

वतन पर जान देने में ही रहमत है ,
ये सब से प्यारी जन्नत है !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...