Saturday, 2 February 2019

नज़रें देखना चाहती है !


नज़रें देखना चाहती है ! 
•••••••••••••••••••••••••
पहले पहल किसको पता 
होता है क्यों ये आँखें बार 
बार और एक सिर्फ उसको 
ही क्यों देखना चाहती है;

क्यों आँखें सिर्फ एक उसको 
होने देना नहीं चाहती अपनी 
इन नज़रो एक पल को भी 
ओझल है;  

पर यही आदत कब सेंध लगा 
कर बस जाती है दिल में बनकर 
चाहत पता ही नहीं चलता है;  

जब तक की लोग ना पूछने लग 
जाए की तुम्हे हुआ क्या है और 
उस दिन आकर जब वो देखता है;

खुद को दर्पण में तो खुद को 
ही नहीं पहचान पाता है जैसे 
किसी अजनबी ने कब्ज़ा कर 
लिया हो उसके व्यक्तित्व पर;  

उसके उस चेहरे पर और वो  
चेहरा तो उस चेहरे जैसा है 
जिसको मेरी ऑंखें बार बार 
देखना चाहती है !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...