Wednesday, 12 June 2019

तेरी याद !


वो आकर मेरे दर पर आवाज़ देती है
और चली जाती है ,
फिर तेरी याद भी आती है
और आकर चली जाती है ;

मेरी आँखों से आँखे मिलते ही
उसकी ऑंखें नम हो जाती है , 
फिर वो मुझसे अपनी नज़रों को चुराती है
और चली जाती है ; 

ज़िन्दगी की भाग दौड़
मेरे बने बनाये बाल बिगाड़ती है ,
फिर वो मेरे बाल बनाती है
और चुपचाप चली जाती है ;

मुझे चिढ़ाने के खातिर
चाँद के साथ अठखेलियाँ करती है , 
और चांदनी मेरा दर्द बढाती है
और फिर चली जाती है ; 

ये मोहब्बत भी कितनी
अजीब चीज़ है " प्रखर " ,
मेरी शाम के चंद लम्हों को सजाती है
और चली जाती है !

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...