Thursday, 6 June 2019

लहजे को नर्म करो !


इश्क़ को यूँ आत्मसात करो ,
ख़त्म तुम अपनी ज़ात करो ;

इश्क़ से जब मिलने जाओ ,
पहले ख़ुद को तुम तैयार करो ; 

दिन भर खुद के साथ रहो , 
इश्क़ में बसर अब रात करो ; 

रात की ज़ुल्फ़ सँवर जाए ,
गर हिज्र को तुम वस्ल करो ;

इश्क़ को तुम दिल में बसाओ ,  
फिर उसकी धड़कनों पर कब्ज़ा करो ; 

मुझ पर कुछ ऐसे प्यार लुटाओ ,
बंजर जमीन पर जैसे बरसात करो ;

बात हो जब भी इश्क़ के बारे में , 
अपने लहजे को तुम थोड़ा नर्म करो ; 

उम्र की पूँजी यूँ ही ख़त्म ना हो ,
कुछ कम खर्च तुम इसे उस पर करो ; 

नयनों का अमृत चखने के लिए , 
तर्क सभी तुम आज़माया करो !

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