Thursday, 27 June 2019

एक सच !


एक सच !

तुमसे अच्छा मुझे 
तुम्हारा नाम लगता है 
जो हमेशा ही रहता है  
मेरे आस-पास ही  
महका-महका सा 
और जब धीमे से 
मैं गुनगुनाता हूँ 
तुम्हारा वो नाम
तो हवा में घुल कर
वो हवा को भी जैसे 
महका जाता है   
कभी-कभी वो नाम  
मुझे खिड़की से झांकती 
रेशमी-मुलायम सी 
सुबह के सूरज की
पहली किरण सा 
ही लगता है 
तो कभी मुझे 
वो सर्द रातों में 
गर्म लिहाफ सा 
लगता है वो तुम्हारा 
नाम मुझे कभी-कभी 
तुमसे भी अच्छा लगता है !

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