प्रेम होता है अलौकिक !
•••••••••••••••••••••••••
कैसे लौकिक इंसान का
लौकिक प्रेम भी अलौकिक
हो जाता है;
वो सारे सितारे जो इतनी
दूर आसमां की गोद में
टिमटिमाते हुए भी;
गवाह बन जाते है,
उन प्रेमी जोड़ियों
के जो सितारों के
इतने दूरस्थ होने
के बावजूद भी;
उनकी उपस्थिति को
अपने इतनी निकट
स्वीकारते है की;
अपनी हर बात को
एक दूजे के कान में
फुसफुसाते हुए कहते है;
वो सितारे जो आसमां
की गोद में अक्सर ही
टिमटिमाते रहते है;
वो ही इन प्रेमी जोड़ों
के प्रेम के अलौकिक
गवाह बन जाते है;
इस लोक के प्रेम को
अलौकिक प्रेम का दर्जा दिलाने के लिए !
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
उषा का प्रादुर्भाव
उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...
-
भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ___________________ बदल सकता है,प्रेम का रंग ; बदल सकता है ,मन का स्वभाव ; बदल सकती है ,जीवन की दिशा ; ...
-
तेरी याद जैसे ध्रुवतारा वयस्तताओं के महाजंगल में घोर उपेक्षाओं के सागर में निर्मम विरह औऱ तड़पते से तपते मरुस्थल में राह ...
-
माँ तुझे सलाम ! •••••••••••••••••• माँ तू मिटटी है, तुझ में मिलकर तुझे सलाम किया है; ख़ुशबू बन कर तेरे ही दिल में सि...

No comments:
Post a Comment