Tuesday, 18 September 2018

तुम्हारे साथ जिया वो एक दिन_2

तुम्हारे साथ जिया वो एक दिन_2

तुम्हारे साथ जिया वो एक दिन 
जिस एक पुरे दिन तुम साथ थी 
मेरे उस दिन कि छोटी से छोटी 
एक-एक बात याद है मुझे;

फिर जब महकती उस रात की  
ठण्ड में बादलों ने भी निभाई थी 
अपनी शानदार भूमिका;

बादलों ने खुद को थोड़ा सा  
निचोड़ कर अपनी कुछ बूँदें 
टपकाई तब हवा के झोंके ने 
भी की जैसे छोटी सी शरारत;

नन्हा सा हवा का झोंका रूककर 
तुम्हारे उलझे हुए बालों से खेलने 
लगा था तब जिस मासूमियत से 
तुमने देखा मुझे था अचानक;

और उस झोंकों को था जोर से झंझोड़ा  
झोंका जैसे ठिठक कर खड़ा हो गया था 
कमरे के एक कोने में जाकर और तुम 
खिलखिलाकर हंस पड़ी थी मुझ पर;

उस एक पुरे दिन जब तुम साथ थी मेरे  
उस दिन कि छोटी से छोटी एक-एक 
बात आज भी उसी तरह याद है मुझे!
क्रमशः जारी 

No comments:

उषा का प्रादुर्भाव

  उषा का प्रादुर्भाव आगमन का विषय नहीं, आविर्भाव का आलोक है— वह कहीं से चलकर नहीं आती, अंतरिक्ष की अंतरसलिला से सहसा प्रस्फुटित होती है। ...